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पंचवर्षीय योजनाओं के अंतर्गत आवास

  1. भारत में नगर विकास और आवास की नीतियां 1950 के दशक से बनती रही हैं । शहरी आबादी का दबाव और आवास तथा प्राथमिक सेवाओं का अभाव 1950 के दशक के प्रारम्भ में बहुत अधिक सुस्पष्ट था । विशाल जनसंख्या वाले देश में, सभी को आश्य उपलब्ध कराना नागरिक समाज और सरकार की भारी चिंता का एक विषय रहा है । अत: सामान्यतया यह कल्पना की गई है कि कमज़ोर वर्गों की आवासीय अपेक्षाएं पूरी करने और एक स्वयं धारणीय आधार पर सभी के लिए आश्य के प्रावधानार्थ एक समर्थकारी पर्यावरण बनाने के लिए राज्य का हस्तक्षेप आवश्यक है । सरकार की ओर से ठोस पहल 1950 के दशक में प्रथम पंचवर्षीय योजना (1951-56) के रूप में शुरू  हुई जिसमें समाज के कमज़ोर वर्गों पर आवास एवं संस्थागत भवन निर्माण पर ध्यान केन्द्रित किया गया था । पश्चात्वर्ती पंचवर्षीय योजनाओं में सरकारी कार्रवाई ग़रीबों के लिए प्रावधान बढ़ाने से लेकर देश के ग्रामीण एवं शहरी क्षेत्रों में आवास के लिए बहुत सी योजनाएं प्रारम्भ करने तक रही । भारत में आवास विकास के प्रारम्भिक वर्षों में अधिकांश पहल सरकार की ओर से की गई थी और यह केवल हाल ही के वर्षों में है कि निजी भवन निर्माण संबंधी गतिविधि ने मुख्य रूप से आवास/भू संपदा विकास के क्षेत्र में शहरी अथवा अर्धशहरी इलाकों में सार्थक योगदान किया है ।
  2. ग़रीबों के लिए आवासीय कार्यक्रम की गुंजाइश द्वितीय योजना (1956-61) में बढ़ा दी गई थी । औद्योगिक आवासीय योजना का विस्तार सभी कामगारों को शामिल करने के लिए किया गया था । नई योजनाएं, नामत: ग्रामीण आवास, गंदी-बस्ती सुधार और सफाई कर्मियों  का आवास, इत्यादि लागू की गई थीं ।
  3. 1959 में केन्द्र सरकार ने पर्याप्त संख्या में भवन निर्माणस्थल उपलब्ध कराने के लिए भूमि के अधिग्रहण एवं विकासार्थ 10 वर्षों की अवधि के लिए राज्य सरकारों को ऋण के रूप में सहायता देने के प्रयोजन से एक योजना घोषित की थी । तृतीय योजना (1961-65) में आवासीय कार्यक्रमों के लिए सामान्य निर्देश सभी अभिकरणों के समन्वय प्रयास और अल्प आय वर्ग के लिए कार्यक्रमों का स्थान निश्चित करना था ।
  4. चौथी योजना (1969-74) ने बड़े नगरों में बढ़ती आबादी को और भीड़-भाड़ को रोकने और छोटी उपनगरियां बसाने के माध्यम से आबादी के वितरण का व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाया था । आवास एवं नगर विकास निगम आवासीय एवं नगर विकास के कार्यक्रमों के निधिकरण के लिए स्थापित किया गया था । बुनियादी ढांचे के सुधार के लिए एक योजना भी पूरे देश के नगरों में प्राथमिक सुख-सुविधाएं प्रदान करने के लिए चलाई गई थी ।

    पांचवीं योजना (1974-79) ने शहरीकरण पर बढ़ते दबाव को कम करने के लिए नए शहरी केन्द्रों में छोटे कस्बों के संवर्धन के लिए पूर्ववर्ती योजनाओं को दोहराया । नगर भूमि (अधिकतम सीमा और विनियमन अधिनियम शहरी क्षेत्रों में संकेन्द्रण को रोकने के लिए और मध्य तथा अल्प आय वर्ग के लिए मकानों के निर्माण हेतु भूमि उपलब्ध कराने के लिए बनाया गया था ।
  5. छठी योजना (1980-85) में विशेष रूप से ग़रीबों के आश्य के साथ सेवाओं के प्रावधान पर पुन: ध्यान केन्द्रित किया गया । सातवीं योजना (1985-90) ने निजी क्षेत्र पर मकानों के निर्माण का भारी उत्तरदायित्व देने की ज़रूरत पर बल देते हुए सरकारनीत आवास विकास पर केन्द्रित ध्यान उल्लेखनीय रूप से हटा लिया । सार्वजनिक क्षेत्र को तिगुनी भूमिका सौंपी गई - अर्थात् आवासार्थ संसाधन जुटाना, ग़रीबों के लिए आर्थिक सहायतागत आवासीय प्रावधान करना और भूमि का अधिग्रहण एवं विकास करना । आवास क्षेत्र के लिए संस्थागत वित्त का प्रवाह बढ़ाने तथा आवास वित्त संस्थानों का संवर्धन एवं विनियमन करने के लिए 1988 में भारतीय रिज़र्व बैंक के तत्वावधान में राष्ट्रीय आवास बैंक स्थापित किया गया था । सातवीं योजना ने स्पष्ट रूप से भी शहरी ग़रीबों की समस्याओं को स्वीकार किया था और पहली बार ग़रीबों के लिए शहरी प्राथमिक सेवाएं नामक एक शहरी ग़रीबी उपशमन योजना लागू की गई थी । राष्ट्रीय आवास नीति 1988 में घोषित की गई थी । राष्ट्रीय आवास नीति का दीर्घावधि लक्ष्य गृहविहीनता को समूल नष्ट करना, अपर्याप्त रूप से रह रहे लोगों की आवासीय स्थिति सुधारना और सभी के लिए न्यूनतम स्तर की प्राथमिक सेवाएं एवं सुख-सुविधाएं प्रदान करना था । सरकार की भूमिका कमज़ोर वर्गों और ग़रीबों के लिए एक प्रदाता के रूप में तथा अन्य आय वर्गों के लिए एक सुविधा प्रदाता के रूप में तथा बाधाएं दूर करके एवं सेवाओं एवं भूमि की आपूर्ति बढ़ाकर निजी क्षेत्र के रूप में कल्पना की गई थी ।
  6. 8वीं योजना (1991-92) में पहली बार राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के लिए शहरी क्षेत्र की भूमिका एवं महत्व को स्वीकार किया गया था । 1998 में अनावृत्त नई आवास और पर्यावास नीति का लक्ष्य "सभी के लिए आश्य" और सार्वजनिक, निजी तथा पारिवारिक क्षेत्रों में अप्रयुक्त संभाव्यता का प्रयोग करके सभी नागरिकों का जीवन-स्तर बेहतर सुनिश्चित करना है । नीति का प्रमुख उद्देश्य आवासीय समस्याओं को हल करने के लिए सार्वजनिक-निजी-भागीदारी मज़बूत करना था । नई नीति के अधीन, सरकार का प्रस्ताव राजकोषीय रियायतें देने, कानूनी एवं विनियामक सुधार करने तथा आवास क्षेत्र के विकास के लिए एक समर्थकारी वातावरण तैयार करने का है । नीति ने निजी क्षेत्र की भूमिका पर बल दिया, क्योंकि अन्य भागीदार को भूमि का जमावड़ा आवास निर्माण और आधारिक सुविधाओं में निवेश करने के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा । जबसे आवास विकास में निजी पहल पर अधिक बल दिया गया था, तब से मुख्य रूप से महानगरीय केन्द्रों और तेज़ी से बढ़ रही अन्य उपनगरियों में भू संपदा विकासकों के प्रादुर्भाव के साथ आवास में निजी निवेश में तीव्र वृद्धि हुई है ।
  7. योजना आयोग ने आवास नीति में आशोधन का सुझाव दिया कि उसमें ग़रीबी रेखा से नीचे के वर्ग के लिए वहनीय आवास के कार्यक्रम शामिल किए जाएं । नौवीं एवं दसवीं पंचवर्षीय योजनाओं के दौरान संसाधन आधार बढ़ाने और शहरी क्षेत्रों में आवासीय वितरण में वृद्धि करने के लिए अभिनवकारी संस्थागत उपायतंत्र प्रारम्भ करने के लिए पर्याप्त प्रयास किए गए थे । ग़रीबों और समाज के कमज़ोर वर्गों को शामिल करने के लिए भी संकेन्द्रित प्रयास किए गए थे जिससे कि वे प्राथमिक आश्य से संबंधित सेवाओं तक पहुंच सकें । वैधानिक उपायों के साथ जुड़ी राजकोषीय रियायतें व्यक्तियों और कंपनियों द्वारा आवास में वर्धित निवेश को प्रोत्साहित करने के लिए भी प्रारम्भ की गई थीं ।
  8. राष्ट्रीय साझे न्यूनतम कार्यक्रम में कहा गया है कि ग्रामीण क्षेत्रों में कमज़ोर वर्गों के लिए मकान बड़े पैमाने पर दिए जाएंगे । इसलिए दसवीं योजना में सुझाया गया था कि मुफ्त मकानों का प्रावधान केवल भूमिहीन अ.जा./अ.ज.जा. के परिवारों के लिए किया जाएगा और ग़रीबी रेखा से नीचे के अन्य परिवारों को ऋण एवं आर्थिक सहायता दी जाएगी । 1976 के नगर भूमि (अधिकतम सीमा एवं विनियमन) अधिनियम का निरसन नगर भूमि बज़ार में सुधार के प्रति एक सार्थक कदम रहा है । केन्द्रीय विधान के निरसन का पालन करते हुए, बहुत सी राज्य सरकारों ने भी राज्य-स्तरीय कानून को रद्द कर दिया था ।
  9. शहरी क्षेत्रों में जीवन-स्तर सुधारने के लिए ग्यारहवीं पंचवर्षीय  योजना (2007-2012) में नई उपनगरियों के अतिरिक्त, वर्तमान नगरों में नए आवासीय स्टॉक के विकास और स्वस्थाने गंदी-बस्ती सुधार, शहरी नवीनीकरण के ज़रिए समुन्नत आवासीय स्टॉक की ज़रूरत पर बल दिया है । इसके साथ ही, भारत निर्माण कार्यक्रम में भी आश्य विहीनता का अंत करने की ज़रूरत स्वीकार की गई है और इसे सम्यक प्राथमिकता प्रदान की गई है । कार्यक्रम में 2005 से 2009 तक 60 लाख मकान बनाने का एक लक्ष्य निर्धारित किया जाना है । कार्यक्रम के अधीन आवासीय संघटक इंदिरा आवास योजना के समानान्तर क्रियान्वित किया जा रहा है । ग्यारहवीं योजना के लिए, अन्य हस्तक्षेपों के साथ मकानों की बाकी कमी का लक्ष्य रखते हुए, ग़रीबों में सभी सर्वाधिक ग़रीबों पर लक्ष्य संकेन्द्रित किया गया है ।
 
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